निश्चित
ही बाल स्वरूप ईश्वर की प्रतिमूर्ति होती है. 1 दिन से भी कम जिसे इस दुनिया में
हुए हैं, उसका स्पर्श पाना, उसके दर्शन करना शायद ही किसी के लबों पर मुस्कान ना
छोड़े. उसकी हर एक हरकत उसे देखने वाले को इतनी खूबसूरत दिख रही थी मानो कोई नया
नवेला फूल, कली से निकला हो, मानो इस संसार रूपी खेत में नया पौधा अंकुरित हुआ हो.
एक स्पर्श मात्र से उसकी नन्ही नन्ही उँगलियों का गुलाब की पंखुड़ियों के समान
खुलना इतना प्यारा था कि उन उँगलियों को गुलाब की नहीं बल्कि उस गुलाब को उन छोटी
छोटी उँगलियों की उपमा देकर अलंकृत करने का मन हो जाए. उसके कानों के नजदीक छोटी सी
आवृत्ति की ध्वनि सुनकर उसकी वो प्यारी प्यारी आँखें एसे खुल और बंद हो रही थी मानों
आकाश में तारों की टिमटिमाहट की खूबसूरती भी फीकी लगे. आधी नींद में अपने आस पास हल्की
सी हलचल से वो जागती और उबाई लेने को अपने होठों को एक दूसरे से अलग करती और फिर
जोड़ लेती, एसा लगता मानो कोई तितली अपने पंखों को फैला और सिकुड़ा रही हो. हम में से
किसी ने भी ईश्वर के असली स्वरूप के दर्शन नहीं किए थे. लेकिन उस बालस्वरूप को
देखकर एसा जरुर लग रहा था कि शायद ही ईश्वर भी इससे खूबसूरत और ओजपूर्ण होगा. सही
मायनों में उसको देखना ईश्वर के यथार्थ स्वरूप के दर्शन करने के ही समान था.

ना जाने समाज में क्यों स्त्री
पुरुष के स्वरूप को इतना अलग समझ कर एक नए नवेले पौधे को ऐसे तोडकर फेंक देने की
मानसिकता धर करके बैठी हुई है. अपने निराधार, अतार्किक स्वार्थों को पैमाना बनाकर
गर्भ में ही पल रहे एक भ्रूण को जीने के लायक ना समझने की मानसिकता निश्चित ही
समाज को त्राहि त्राहि करने के कगार पर लाने वाली मानसिकता है. ईश्वर की एसी कृति
जिसमे सबसे ज्यादा सोचने समझने, विवेकाधीन कार्य करने की क्षमता है, वो ही ईश्वर
के द्वारा बनाए गए इस संसार का इस प्रकार से ह्रास करेगा तो शायद ही उससे निर्मम
जानवर कोई होगा.इस संसार में आए एक नव अंकुरित शरीर की खूबसूरती को ना जाने क्यों
इन्सान पहचान नहीं पाता. विवेकशून्य और विकारों से भरी पड़ी इंसानी सोच शायद अपने स्वार्थों
में इतना खो चुका है कि जीवन की खूबसूरती को भी उसका मनो मष्तिक देखने से इंकार कर
रहा हो. 