Friday, May 17, 2019

बाल स्वरूप


         

           निश्चित ही बाल स्वरूप ईश्वर की प्रतिमूर्ति होती है. 1 दिन से भी कम जिसे इस दुनिया में हुए हैं, उसका स्पर्श पाना, उसके दर्शन करना शायद ही किसी के लबों पर मुस्कान ना छोड़े. उसकी हर एक हरकत उसे देखने वाले को इतनी खूबसूरत दिख रही थी मानो कोई नया नवेला फूल, कली से निकला हो, मानो इस संसार रूपी खेत में नया पौधा अंकुरित हुआ हो. एक स्पर्श मात्र से उसकी नन्ही नन्ही उँगलियों का गुलाब की पंखुड़ियों के समान खुलना इतना प्यारा था कि उन उँगलियों को गुलाब की नहीं बल्कि उस गुलाब को उन छोटी छोटी उँगलियों की उपमा देकर अलंकृत करने का मन हो जाए. उसके कानों के नजदीक छोटी सी आवृत्ति की ध्वनि सुनकर उसकी वो प्यारी प्यारी आँखें एसे खुल और बंद हो रही थी मानों आकाश में तारों की टिमटिमाहट की खूबसूरती भी फीकी लगे. आधी नींद में अपने आस पास हल्की सी हलचल से वो जागती और उबाई लेने को अपने होठों को एक दूसरे से अलग करती और फिर जोड़ लेती, एसा लगता मानो कोई तितली अपने पंखों को फैला और सिकुड़ा रही हो. हम में से किसी ने भी ईश्वर के असली स्वरूप के दर्शन नहीं किए थे. लेकिन उस बालस्वरूप को देखकर एसा जरुर लग रहा था कि शायद ही ईश्वर भी इससे खूबसूरत और ओजपूर्ण होगा. सही मायनों में उसको देखना ईश्वर के यथार्थ स्वरूप के दर्शन करने के ही समान था.
       





              ना जाने समाज में क्यों स्त्री पुरुष के स्वरूप को इतना अलग समझ कर एक नए नवेले पौधे को ऐसे तोडकर फेंक देने की मानसिकता धर करके बैठी हुई है. अपने निराधार, अतार्किक स्वार्थों को पैमाना बनाकर गर्भ में ही पल रहे एक भ्रूण को जीने के लायक ना समझने की मानसिकता निश्चित ही समाज को त्राहि त्राहि करने के कगार पर लाने वाली मानसिकता है. ईश्वर की एसी कृति जिसमे सबसे ज्यादा सोचने समझने, विवेकाधीन कार्य करने की क्षमता है, वो ही ईश्वर के द्वारा बनाए गए इस संसार का इस प्रकार से ह्रास करेगा तो शायद ही उससे निर्मम जानवर कोई होगा.इस संसार में आए एक नव अंकुरित शरीर की खूबसूरती को ना जाने क्यों इन्सान पहचान नहीं पाता. विवेकशून्य और विकारों से भरी पड़ी इंसानी सोच शायद अपने स्वार्थों में इतना खो चुका है कि जीवन की खूबसूरती को भी उसका मनो मष्तिक देखने से इंकार कर रहा हो.     

Wednesday, May 1, 2019

वो-2


            वो अभी भी अपनी जिन्दगी हंसी ख़ुशी, उत्साह उमंग के साथ जी रहा था. जो मन में आता कर देता, जो मन में आता कह देता. उसके लिए कोई छोटा बड़ा नहीं था, चाहे उम्र के लिहाज से हो चाहे किसी ओर पैमाने के. अब धीरे धीरे उसका शब्दकोश और ज्ञानकोश और भी अधिक बढ़ रहा था, और अपनी आँखों के सामने घटने वाली हर घटना पर गौर भी कर रहा था. हर एक घटना को गौर से देखता, उसके बारे में सबसे पूछता, सामने दिखने वाली हर चीज के बारे में जानने की हमेशा उसमें उत्सुकता रहती. बिना उत्तर जाने वो चुप ना बैठता.  हर एक प्रकल्पना का उसे उसकी समझ के अनुरूप तार्किक उत्तर चाहिए रहता था. उसकी  रचनात्मकता अब और भी मजबूत होती जा रही थी. चाहे सामने पड़े उसके खिलौने हों चाहे घर का कोई सामान हर एक चीज को जानने की उसमे कौतूहलता बनी ही रहती. कई बार तो खिलौनों और अन्य सामानों को पटक पटक तोड़ देता. सामने गाने वाले टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले चित्रों पर भी बार बार हाथ मारता रहता. अपने सामने पड़े खिलौने, जिनमें से कुछ एक में कुछ गानों की धुनें आ रही थीं तो किन्हीं में से कुछ अलग अलग आवाजें. लेकिन उसके लिए ये अचरज भरा था कि कुछ एक ही चीजों  से ये आवाजें क्यों आती हैं. वो कभी कभी हर एक चीज को खोल देता, तोड़ देता बस यही जानने की जिज्ञासा में कि वो आवाजें उसे सुनाई क्यों दे रही हैं. वो कभी कभी खिलौनों के पेज पुर्जों को अलग अलग कर विभिन्न तरीकों से जोड़ने की कोशिश भी करता. हर एक चीज के बारे में जानने की जिज्ञासा के प्रति एसा समर्पण और इतने कर्म करने में लगने वाली ऊर्जा ना जाने उसमे कहाँ से आती.
           “भगवान” इस शब्द की सुपरिभाषित व्याख्या उसे आजतक समझ ना आई थी. खैर उसे इतना जानने की जरूरत भी महसूस ना होती क्योंकि भगवान कभी उसके सामने आकर कुछ करते भी कहाँ थे. लोग भी उसे यही बताते कि घर में, मन्दिरों में एक शिला, एक तस्वीर है बस वही हैं जो भगवान हैं, ईश्वर हैं. शुरुआती दौर में उसे बस यही पता होता कि ईश्वर के सामने हाथ जोड़ना होता है. ईश्वर की पूजा में होने वाली आरतियाँ भी उसे अच्छी लगती. पूजा के समय आने वाली घंटियों की आवाजें और शंख ध्वनि भी उसे खुश कर देती. वो भी उन वाद्य यंत्रों को बजाने की कोशिश करता, और जितना जोर लग पाता उतने जोर से घंटियों को बजाने की कोशिश करता. उसने लोगों को यह कहते भी सुना था कि बच्चे भी भगवान का ही स्वरूप होते हैं. लेकिन चूंकि वो भगवान को ही नहीं जानता था, तो एसी बातों को भला क्या समझता. ईश्वर की पूजा के विभिन्न विधानों, नियमों, परम्पराओं, कर्मकांडों को वह नहीं समझता था. किन्तु उसे यह अवश्य पता था कि ईश्वर मांगों को पूरा करते हैं.
           एक दफा उसकी बड़ी बहन को खेलते खेलते चोट लगी तो वह घर के बाहर से कीचड़ में भीगे चप्पलों को लेकर घर के पूजा घर में पंहुच गया और शिला रूपी ईश्वर से अपनी बहन की चोट ठीक करने की नादान गुजारिश करने लगा. इसी बीच घर के किसी बड़े ने उसे कीचड़ से लबालब पादुकाओं सहित मन्दिर में देखा तो उसे यह कहकर समझाने लगे कि ईश्वर के मन्दिरों में इस प्रकार गंदगी सहित जाएँगे तो ईश्वर तुम्हारे साथ बुरा करेंगें, हो सकता है आँख भी फोड़ दें. अबसे वह ईश्वर से डरने लगा था. अब तो कभी कभी ईश्वर को नादानी में अपनी मांग पूरी करने के लिए रिश्वत भी दे देता, कभी चॉकलेट,कभी मिठाई की तो कभी खिलौनों की. उसका स्वच्छ मन शायद अब धीरे धीरे ईश्वर के उस रूप को समझने में नाकाम होने लगा था, जिसे श्रद्धा रूपी भावों से पूजा जाता है ना कि डर से. और जीवन की प्रौढ़ावस्था शुरू होने के पश्चात से उसके जीवन में आने वाले विभिन्न तनावों के बढने और उनसे मुक्ति पाने के लिए ही वह ईश्वर के उसी एक आयाम की पूजा करने लगा, जो बस मांगें पूरी करता है और मन्दिर में गंदगी लाने पर दंडित करता है. साथ साथ अब उसे साँस लेने वाले हाथ पांव हिलाने वाले बाबाओं जो कि चाउमीन, मोमो खाकर समस्याओं का हल बताने वाले भी ईश्वर से बड़े प्रतीत होने लगे थे.   
          प्रभात ड्यूंडी

Tuesday, April 30, 2019



“वो”
          वो दिखने में किसी के लिए भी कुछ अलग सा नहीं था, लेकिन तभी भी बहुत से लोग उसे देखे जा रहे थे क्योंकि उन लोगों को उसमे कुछ तो अलग सा दिख रहा था. उसकी हर क्रिया लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी; हंसना, रोना, चिल्लाना उसकी हर एक बात में लोगों को बस खूबसूरती ही दिख रही थी. उन्हें उसे बस एक टक देखने का मन कर रहा था. शायद ही उनमे से किसी को उससे नजरें फेरना मंजूर हो. उसके नाना प्रकार के क्रियाकलाप उन्हें आत्मीय सुख दे रहे थे.
            


              उन सबके बीच बस वही एक था जो समाज की सभी परम्पराओं से मुक्त होकर बस स्वतन्त्रता का आनन्द ले रहा था. वो जो करता निश्छल मन से करता रहता. निष्कपट भाव से वो बस ख़ुशी ख़ुशी जी रहा था. शायद उसे या तो जीने का सही तरीका मालूम था या तो उसने अन्य लोगों की भांति जीवन जीना ही नहीं सीखा था. वो लोगों को बिना जात-पात, ऊंच नीच, धर्म  के तराजू में तोले देखता था. उसके लिए भगवान भी शायद बस वही था जो उसकी मांगों की खानापूर्ति कर दे. और उसकी ऊर्जा एसी थी मानो बड़े से बड़े दौड़ भाग करने वाले  खिलाडी की ऊर्जा उसकी ऊर्जा के सामने बहुत छोटी सी हो. और किसी जिद के प्रति एसी एसा समर्पण भाव कि बिना मनवाए ना माने. उसकी रचनात्मकता का शायद ही उस समय कोई सानी हो. कोई भी भाव वो अपने अंदर नहीं छिपाता. चाहे वो प्यार का हो या गुस्से का हर भाव को पूरी ऊर्जा के साथ प्रकट करता. शायद उसे अभी तक खुद को छिपाना नहीं आया था. उसके अंदर अभी द्वेष, इर्ष्या, घृणा आदि भावों का प्रादुर्भाव होना शुरू भी नहीं हुआ था. उसे सब अपने से लगते, चाहे वह किसी भी जाति धर्म का हो. लोगों को भी वह संसार का सबसे सुखी जीव लगता, जिसकी जिन्दगी चिंतामुक्त, तनावरहित थी. सब लोग उस जीवन की अपेक्षा कर रहे थे, कि काश वे भी ऐसे ही चिंतामुक्त हो पाते, किन्तु उन लोगों में से शायद ही कोई ऐसा हो जो उसके सुखी होने के लक्षणों को खुद के भीतर समावेशित करना चाहता हो. वो सब उसके जैसा बनना चाह रहे थे लेकिन उन गुणों को आत्मसात करने का साहस उनमे से कोई भी जुटा नहीं पा रहा था. वो शायद उनके मनो-मष्तिष्क के भीतर घूम रहा बस उनका बचपन था.  
                                                                                                           प्रभात ड्यूंडी 

Friday, January 25, 2019


गाँव और त्यौहार
                लुप्त होते स्थानीय त्यौहारों की इस श्रृंखला में एक और त्यौहार का नाम जुड़ने जा रहा हैं. इस त्यौहार का नाम है “पंवाड़’’  जो शायद उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में यह त्यौहार ना मनाया जाता हो, लेकिन मेरे गृह क्षेत्र ग्वालखेत में किसी समय यह त्यौहार काफी हर्षोल्लास से मनाया जाता था. अभी के समय में शायद ही कोई विलुप्त होने की कगार पर खड़े इस त्यौहार को मना रहा हो.


                 
                      कोई भी जीव हो, अपनी जिन्दगी में संघर्ष अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए ही करता है. कहा जाता है ना कि सबसे बड़ा भगवान पेट होता है. इसलिए किसी समय में अपने दाना पानी के लिए पूर्ण रूप से अपने खेत, अपने जानवरों पर निर्भर रहने वाले इन्सान के लिए उसके खेत और जानवर ही सबसे बड़े ईश्वर हुआ करता था. किन्तु आधुनिकता के इस तथाकथित समुचित रूप से विकसित युग में खान पान के लिए बाजारू खाने पर निर्भर होते आज के समाज के लिए अपने इन संसाधनों की आज उतनी महत्ता नहीं है, जितनी पहले हुआ करती था. किसी समय में लोगों के लिए होली, दिवाली से बड़े त्यौहार की मान्यता प्राप्त यह त्यौहार आज बस परम्परा की संज्ञा पाकर विलुप्त होने की कगार पर खड़ा हो गया है. 




              “पंवाड़” संज्ञा प्राप्त इस त्यौहार का चलन और महत्व बहुत अधिक इसीलिए भी था क्योंकि ये त्यौहार हमारे खेत और जानवरों से सम्बन्धित था. चैत्र माह में मनाए जाने वाले इस त्यौहार के लिए पंडितों द्वारा सर्वप्रथम इस त्यौहार की पूजा का लग्न निकाला जाता था. बुजर्गों के अनुसार लग्न निकालने की इस प्रक्रिया में बीज बोये  जाने का दिन देखा जाता है, और इस प्रक्रिया को “राशिपेट देखना” कहा जाता है.त्यौहार के दिन त्यौहार मनाने की प्रक्रिया का शुभारम्भ घर की साफ़ सफाई से होता है.शाम को सर्वप्रथम घर में पितरों की पूजा का प्रावधान है, जिसमे पितरों को दही-घी , चावल, आदि का भोग लगाया जाता है. 
            
                 इसके पश्चात शाम को लाए गए बुरांश के पत्तों द्वारा एक विशेष पात्र (पूड़े) बनाया जाता है. जिनकी संख्या 5 होती है. इसके पश्चात सभी परिवारों द्वारा पंवाड़ पूजा के लिए विशेष पकवान बनाए जाते हैं. ये पकवान उड़द दाल के पकौड़े, दाल, चावल इत्यादि हैं. व्यंजन निर्माण के पश्चात सभी पकवान,दही,  पानी एवं पूजा की सामग्रियों को लेकर अपने नजदीकी खेत में जाते हैं. खेत में पंहुचकर पांच पत्थरों को देव स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है. पूजा विधि में सर्वप्रथम इन देव स्वरूपी पत्थरों को तिलक लगाकर खड़ा किया जाता है. इसके उपरांत देव स्वरूपी पत्थरों के सामने 3, 5 या 7 मुट्ठी धान बोया जाता है. इसके पश्चात बुरांश के पत्तों से निर्मित पात्रों को पूजा स्थल पर रखकर 3 पात्रों या पूड़ों में चावल (भात), दाल और दही लिया जाता है, चौथे पात्र में पकोड़े व अंतिम पात्र में पानी लिया जाता है. इसके पश्चात इन देव स्वरूपी पत्थरों की पूजा की जाती है. इसके पश्चात देवों को भोग चढाने के लिए लाए गए पकवानों में से भोग के पश्चात बचे पकवान को पूजा करने के लिए पंहुचे छोटे बच्चे ग्रहण करते हैं. और खेतों से घर लौटते समय बच्चों के द्वारा “साट्यूँ का भारा, समोया का धारा" गाने  के साथ ही इस त्यौहार का समापन होता है.       

by प्रभात ड्यूँडी       

Monday, January 21, 2019

किस्सों में सिमटते कुछ स्थानीय त्यौहार


गाँव और त्यौहार
           देवों की इस पवित्र देवभूमि में दिवाली,होली व अन्य त्यौहारों से लेकर विभिन्न स्थानीय त्यौहारों को विभिन्न क्षेत्रों में अपने क्षेत्रीय नियमों का अनुपालन करते हुए मनाए जाते हैं. मेरे गृह क्षेत्र ग्वालखेत में भी अनेकों ऐसे त्यौहार मनाए जाते हैं. उनमें से कई ऐसे त्यौहार भी हैं जिनका प्रचलन शायद अब उतना नहीं है, जितना पूर्व समय में हुआ करता है. आज यदि इन त्यौहारों की खूबसूरती को शब्दों में संजो के रखा जाए तो शायद आगे की पीढ़ी इसकी शुरुआत फिर उसी उत्साह के साथ करे.
          




                जहाँ देश विदेशों से पंहुचे पर्यटक शीत ऋतु की बर्फ के दर्शन करने को लालायित रहते हैं, वहीं उत्तराखंड के कई पहाड़ी क्षेत्रों की भांति मेरे ग्रामजनों को भी हर साल की सर्द ऋतु में इस सफेद चादर के गर्म चाय के गिलास के साथ दर्शन का वरदान सृष्टि की उत्पत्ति से ही प्राप्त है. जहाँ ये श्वेत वर्णित मुलायम चीज खूबसूरती की एक मिसाल होती है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में समस्याओं का कारण भी बनती है.

            लेकिन इस अस्थायी समस्या को इतर रखते हुए बात करते हैं, इस बर्फ के एक अलग महत्व की. पर्यटकों के लिए ये सफेद चादर खेल का साधन होता है. वहीं मेरे गाँव के बच्चों के लिए इसकी कुछ अलग महत्ता रहती है. 



          मेरे गाँव के बच्चे इस सफेद चादर को एक देवी के स्वरूप में ढालते हैं व सम्पूर्ण श्रृंगार कर और पूरे गाँव में टोली बनाकर इसे घुमाते हैं.देवी के स्वरूप को “हिंवाली देवी” नाम दिया जाता है. इस टोली को गाँव के सभी परिवार चावल, घी, तेल, गुड़,चीनी आदि देते हैं. अंत में सभी घरों से घूमकर आए बच्चे बर्फ के इस देवी स्वरूप “हिंवाली देवी” को गाँव के ही नंदा देवी मन्दिर में रख आते हैं तथा सभी घरों से एकत्र किए सामान को एक ऐसे स्थान पर ले जाते हैं जहाँ पर इनसे प्रसाद स्वरूप एक विशेष पकवान (दले हुए चावलों का हलुआ) बनाया जाता है. आधुनिकता के इस दौर में कोई परम्परा को भले कुछ भी कहे किन्तु मासूमियत के साथ बनाए गए इस प्रसाद स्वरूप पकवान का स्वाद अवश्य ही हर किसी को आत्मीय सुख की अनुभूति करवाता है.

Friday, January 18, 2019



नन्दाष्टमी
            यूं तो भारतवर्ष त्योहारों का देश है. होली, दिवाली, विजयादशमी, सक्रांति आदि त्यौहार देशभर में काफी हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं लेकिन साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में अपने अपने क्षेत्रीय त्योहार भी सभी क्षेत्र वासियों द्वारा धूम धाम से सम्पन्न किए जाते हैं. जिनमे गढ़वाल क्षेत्र में मनाए जाने वाला एक त्यौहार नन्दाष्टमी या क्षेत्रीय भाषा में कहें तो “पाती” भी है. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाले इस त्यौहार या यूं कहें देवी पूजा के लिए प्रवासी बने लोग भी दूर दूर से अपने गाँवों में देवी से अपनी सुख समृद्धि की कामना करने के लिए देवदर्शन हेतु आए रहते हैं. सामान्यतया नन्दाष्टमी पाती का त्यौहार गढवाल क्षेत्र के उन गांवों में मनाया जाता है जहाँ नंदा देवी ग्रामीणों की ईष्ट देवी कही जाती है. “बधाण क्षेत्र” में नन्दाष्टमी का त्यौहार “स्यल पाती” के नाम से मनाया जाता है.
           
     



 नन्दाष्टमी का यह त्यौहार किसी इलाके में अष्टमी की तिथि को तो किसी क्षेत्र में नवमी की तिथि को मनाया जाता है. नन्दाष्टमी पूजा की शुरुआत पंचमी की तिथि से प्रारम्भ हो जाती है. मेरे गृह क्षेत्र ग्वालखेत में पंचमी के दिन गाँव के सभी परिवार गेंहू की नवीनतम फसल से प्राप्त गेंहू और सरसों को जमा करते हैं. जमा करने की इस प्रक्रिया को ग्रामीण भाषा में “म्य्वाख” कहा जाता है. पूजा में प्रयोग किए जाने के लिए जमा किए गए इस गेंहू को “ब्यूड़ा” कहा जाता है. जमा करने के पश्चात पंचमी को ही गाँव में किसी के द्वारा ब्यूडे भिगाए जाते हैं. जिस व्यक्ति द्वारा ब्यूड़े भिगाए जाते हैं, उन्हें उस दिन का उपवास धारण करना होता है. मेरे गृह क्षेत्र में पंचमी की सुबह को सर्वप्रथम गाँव में ईश्वर के बाल स्वरूप जिन्हें हमारे क्षेत्र में  “रुब्दाणू” देव कहा जाता है, उनकी पूजा का विधान है. इस पूजा के लिए गाँव के सभी परिवार गुड़, तेल, आटा इत्यादि जमा करते हैं. और इससे निर्मित प्रसाद लेकर पुजारी व साथ ही गाँव के बच्चे दूध लेकर ईश्वर के बाल स्वरूप की पूजा हेतु जाते हैं. जहाँ पर पुजारी द्वारा शंख ना बजाए जाने का भी नियम है. गाँव के बुजुर्गों के अनुसार ईश्वर यहाँ बाल स्वरूप में उपस्थित हैं इसलिए यहाँ शंख नहीं बजाए जाने का विधान है. 
          इस पूजा के पश्चात गाँव के जिस व्यक्ति द्वारा गेंहू और सरसों की फसल भिगाई जानी है वे धारे से एक बर्तन में जल लेकर गाँव के नन्दादेवी मन्दिर में जाते हैं तथा वहाँ वे सरसों की फसल को ताम्र धातु के बर्तन में तथा गेंहू की फसल को किसी बर्तन में भिगाते हैं तथा भिगाए गई फसल को मन्दिर में रखते हैं. अगले दिन अर्थात् षष्ठी तिथि को गाँव की महिलाओं द्वारा पिछली तिथि को भिगाई गई फसल को धोया जाता है. यदि गाँव में कोई नवविवाहित बहू आई हो तो उनके लिए इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए एक नियम का विधान है. यदि गाँव में किसी के द्वारा धान की फसल काट ली जाती है तो नवविवाहित बहू प्रक्रिया में शामिल नहीं होती है, लेकिन उस परिवार की अन्य महिला इस पूजा में शामिल हो सकती हैं. इस दौरान की धान कटाई को “ जड़कटी” नाम से उच्चारित किया जाता है. नन्दाष्टमी की पूजा में सम्मिलित लोगों के लिए कड़े नियमों का प्रावधान स्थापित है. इस प्रकिया में शमिल महिलाओं द्वारा षष्ठी की तिथि से लेकर अष्टमी की तिथि तक हर दिन उपवास रखा जाता है.साथ ही महिलाओं द्वारा ब्युड़े धोने के पूर्व किए गए स्नान के पश्चात किसी को भी उन्हें स्पर्श करने की अनुमति नहीं होती है; जब तक कि वे ब्युड़े को धोकर वापस मन्दिर में नहीं रख आतीं. ब्यूड़े भिगाते समय प्रयोग किए गए जल को ब्यूड़े धोते समय गाँव के सभी परिवारों में बाँटा जाता है, तथा वे इस जल को घर के आस पास लगी फसल की जड़ों में प्रवाहित करते हैं.
        मेरे गृह क्षेत्र में पाती का त्यौहार सप्तमी और अष्टमी दो दिन मनाया जाता है. सप्तमी की तिथि को दोपहर के समय तक गाँव के लोग “म्य्वाख” जमा करते हैं, जिसमें कि गुड़, तेल, आटा आदि जमा किया जाता है. इसके पश्चात गाँव से कुछ लोग जमा चीजों में से आधा सामान लेकर कोटी स्थित नंदा देवी के मन्दिर में पंहुचते हैं व वहाँ जमा चीजों से नन्दाष्टमी के प्रसाद की तैयारी करते हैं. तथा प्रसाद स्वरूप गुलगुले, रोंट(मीठी रोटी), हलुआ इत्यादि बनाए जाते हैं. तथा साथ ही रोंट बनाने हेतु गूंथे गए आटे की सहायता से आटे की लुइयों को बाघ, भालू, हिरन आदि जानवरों का आकार दिया जाता है. कहा जाता है कि देवी इन जानवरों से घर गाँव की तथा  लोगों की फसल की रक्षा करती हैं. गाँव के बच्चों द्वारा कुणजा नामक पौधे से दो अलग अलग पाती का निर्माण किया जाता है. और इस पौधे से ही निर्मित पाती को देवी मान कर इसकी पूजा की जाती है. कुणजे से निर्मित पाती के ऊपरी हिस्से में कौणी, जिसे काकनी नाम से भी जाना जाता है, की एक बाली को नथ स्वरूप लगाया जाता है व सम्पूर्ण पाती को देवी नंदा के स्वरूप में ढाला जाता है व मन्दिर परिसर में ही पत्थरों की सहायता से पाती को खड़ा किया जाता है. सप्तमी की पाती को “भितल पाती” नाम दिया गया है. साथ ही बधाण क्षेत्र में मनाए जाने वाले त्यौहार “स्यल पाती” में चीड के पेड़ का प्रयोग कुणजे के स्थान पर होता है.
            


  दूसरी ओर गाँव में नन्दाष्टमी पूजा में ब्यूड़े लेकर आने वाली महिलाएं घर की रसोई की सफाई कर स्नान करने के पश्चात पूजा के लिए तैयार होती हैं. स्नान के पूर्व के वस्त्रों को वे स्नान के पश्चात स्पर्श नहीं करती हैं. साथ ही उन्हें भी कोई स्पर्श नहीं करता है. यदि षष्ठी की तिथि से लेकर अष्टमी तक नन्दाष्टमी पूजा में शामिल होनी वाली किसी महिला को सांप दिख जाए तो भी उन्हें पूजा में शामिल होने की अनुमति नहीं होती. स्नान के पश्चात के श्रृंगार में उन्हें कंघी के भी प्रयोग की अनुमति नहीं होती और ना ही चप्पल इत्यादि पहनने की. इसके पश्चात वे बड़ी टोकरी के आकार का एक पात्र जिसे “छाबड़ी” की संज्ञा दी गई है, में ककड़ी के पत्तों में “खाजा”, “ककड़ी”, मक्का( मुंगरी), ब्यूड़े आदि लेकर नंगे पाँव 1.5 किलोमीटर पैदल पथरीले रस्ते से होकर कोटी स्थित नंदा देवी मन्दिर में आती हैं. नंदा देवी मन्दिर में महिलाओं द्वारा मन्दिर में प्रवेश करने के समय उनके पाँवों को धोया जाने का भी प्रावधान है. इसके पश्चात महिलाएं मन्दिर की परिक्रमा करती हैं. इसके पश्चात मन्दिर में पूजा अर्चना के पश्चात महिलाएं छाबड़ी को गाँव के मन्दिर में रख आती हैं तथा उसी के पश्चात उनको सामान्य दिनों की भांति रहने की अनुमति मिलती है.
            अष्टमी तिथि की पाती को स्थानीय बोली में “भैल पाती” कहते हैं. अष्टमी की पाती के दिन पुजारी के द्वारा सर्वप्रथम कोटी गाँव स्थित मन्दिर में पूजा अर्चना होती है. साथ ही अष्टमी को कोटी तथा ग्वालखेत दोनों गांवों की अपनी अपनी पाती मनाई जाती है, जहाँ कोटी गाँव की पाती कोटी गाँव स्थित नंदा देवी मन्दिर के चौक जिसे “खाल” नाम से उच्चारित किया जाता है, में मनाई जाती है तथा ग्वालखेत की पाती नंदा देवी के नए मन्दिर में मनाई जाती है. दोनों गाँवों में भी पाती के अलग अलग नियम हैं. एक ओर जहाँ कोटी गाँव में पाती पूजा में कोटी की बहुएँ ही नहीं वरन बेटियां भी प्रतिभाग करती हैं, जबकि ग्वाल्खेत की नन्दाष्टमी पूजा में केवल बहुओं को ही प्रतिभाग करने की अनुमति है.
           अष्टमी तिथि की सुबह से ही जिन परिवारों से छाबड़ी ले जाई जाती है, वहाँ देवी के लिए भोग स्वरूप विभिन्न पकवान पकने शुरू हो जाते हैं. जिनमें “रोंटाना”, “खाजा” इत्यादि महत्वपूर्ण भोग माने गए हैं. भोग तैयार करने के पश्चात सर्वप्रथम यह भोग ग्वालखेत गाँव में स्थित नंदा देवी मन्दिर, जीतू देवता मन्दिर, कालिंका मन्दिर में चढाया जाता है.  
           अष्टमी की पूजा के दिन भी दोपहर में गाँव के लोग
प्रसाद सामग्री लेकर कोटी स्थित मन्दिर में पंहुचते हैं तथा कुछ लोग कोटी गाँव स्थित पुराने मन्दिर में देव डोली के नृत्य देखने को पंहुचते है. कोटी तथा ग्वालखेत दोनों गाँवों के ईष्ट देव लाटू देवता तथा देवी नंदा देवी अपने पश्वों पर अवतरित होती हैं तथा देवनृत्य कर भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

           नंदा देवी के मुख्य पुजारी जो कि ग्वालखेत गाँव के ही रहते हैं, वे बांस के डंडों से बने एक पात्र जिसे स्थानीय भाषा में “कंडी” कहा जाता है, उसमें प्राण प्रतिष्ठा युक्त मूर्ति जो कि रजत धातु से निर्मित है; को पुराने मन्दिर से ले कर नए मन्दिर में आते हैं. साथ ही लाटू देवता का निशान तथा नंदा देवी की डोली भी पुराने मन्दिर से नए मन्दिर में पंहुचते हैं. नए मन्दिर स्थित गौरी कुंड में स्नान कर पूजा के पश्चात लाटू देवता के निशान को लेकर पुनः पुराने मन्दिर ले जाया जाता है. नए मन्दिर में स्थित इस गौरी कुंड की विशेषता यह भी है कि कुण्ड में प्रवाहमान होने वाली जलधारा का जल ना तो कभी बढ़ता है और ना ही कभी घटता है, चाहे उफनता बरसात हो या जमीन जल को तरसे इस कुण्ड के और कुण्ड की धारा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. देव डोलियों के स्नान के पश्चात कोटी गाँव की पाती पूजा सम्पन्न होती है. इसके पश्चात लाटू देवता के निशान सहित कोटी गाँव के लोग भी नए मन्दिर में पंहुचते हैं.

           सप्तमी की तिथि के ही नियमों का पालन करते हुए हमारे गाँव की महिलाएं छाबड़ी में रोंटाना, खाजा, ब्यूड़ा, ककड़ी, मुंगरी आदि भोग सामग्रियों को लेकर मन्दिर में पंहुचते हैं, जहाँ लाटू देवता व नंदा देवी अपने पश्वाओं पर अवतरित होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं.यह नियम भी महत्वपूर्ण है कि यदि महिलाओं के द्वारा सप्तमी की तिथि को पहने गए वस्त्रों को कोई स्पर्श कर लेता है तो अष्टमी की पूजा में उन्हें वह वस्त्रों को पहनने की अनुमति नहीं होती है.  नए मन्दिर में स्थित गौरी कुण्ड के जल से देव पश्वा भी स्नान करते हैं. पूर्व तिथि की भांति कुणजे की पौधे व कौणी की एक बाली से निर्मित पाती की पूजा अर्चना की जाती है. मांगल गीतों की पवित्र धुनों के साथ देव पश्वा सभी भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं व ककड़ी मुंगरी रोंटाना आदि को प्रसाद स्वरूप भक्तों को बांटते हैं. और इसी के साथ नन्दाष्टमी की पूजा सम्पन्न होती है. अष्टमी की शाम का भी बहुत अधिक महत्व है. जिन घरों से ब्यूड़े ले जाए जाते हैं वहाँ कुछ नई पैदावार के फलस्वरूप प्राप्त सब्जी तथा कुछ अन्य सब्जियों का मिश्रण कर शाम का प्रसाद तैयार किया जाता है. और इसे रोंटाना व ब्यूड़ा समेत गाँव के सभी परिवारों को दिया जाता है, इस प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में “पैणा देना” कहा जाता है. और शाम के इस शानदार व्यंजन के भोग के साथ नन्दाष्टमी का सम्पूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न होता है.
              आध्यात्म की दृष्टि से उत्तराखंड के सभी स्थानीय त्यौहार महत्वपूर्ण होते हैं. लेकिन साथ ही पर्यावर्णीय महत्व और सामाजिक महत्व की दृष्टि से भी ये महत्वपूर्ण होते हैं. नन्दाष्टमी के त्यौहार का भी सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है. आधुनिकता के इस युग में भी जहाँ कि आज हर कोई एक दूसरे मोबाइल फोन, टेलीफोन आदि से जुड़ा हुआ है. किन्तु पूर्व समय में जब एक दूसरे से सम्पर्क करने के पर्याप्त साधन हर जगह नहीं हुआ करते थे तो विभिन्न त्यौहारों पर भाई अपनी बहनों को बुलाने उनके घरों तक जाते हैं. कभी यह परम्परा मात्र परम्परा ना होकर एक भावना थी, लेकिन आज भी नन्दाष्टमी जैसे कुछ एक के त्यौहारों पर यह परम्परा संजीवनी खोजती रहती है. गाँव की विवाहित बेटियां जिन्हें ध्याण बेटियां कहा जाता है, नन्दाष्टमी के त्यौहार पर आज भी अपने मायके आई रहती हैं. गाँवों में विभिन्न त्यौहारों पर प्रसाद और व्यंजनों को गाँव में बांटने की परम्परा प्रबल रूप से जीवित है. नन्दाष्टमी पर भी देवी के प्रसाद को बांटने की परम्परा है. यही परम्पराएँ गाँवों में आपसी भाई चारे के मजबूत स्तम्भ होती हैं.
          नन्दाष्टमी के त्यौहार के पर्यावर्णीय महत्व को देखा जाए तो कुणजे से बनने वाली पाती की नथ के रूप में प्रयोग होने वाली कौणी या काकनी आज दुनिया भर में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में भी विलुप्त होने की कगार पर है, किन्तु नन्दाष्टमी पूजा के लिए ही सही, लोग ग्रामीण क्षेत्रों में इस वनस्पति को बचाने में लगे होते हैं. साथ ही  नन्दाष्टमी की शाम को बनने वाली सब्जियों में अधिकतर अपने ही खेतों में उगी सब्जी का प्रयोग होता है. अत: कहा जा सकता है कि रोजमर्रा की भोजन व्यवस्था के लिए लोग भले ही बाजारू सब्जियों पर निर्भर होने लगें लेकिन नन्दाष्टमी के त्यौहार के लिए घरों में सब्जियों जरुर उगाई जाएंगी. साथ ही देवी के भोग स्वरूप बनने वाले स्थानीय पकवान जैसे खाजा, मीठी रोटी, रोंट, रोंटाना आदि जो कि उत्तराखंड की संस्कृति के अभिन्न अंग हैं इस त्यौहार के बदौलत हमेशा जीवित रहेंगे.  
 
BY- प्रभात ड्यूंडी  

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