गाँव और त्यौहार
लुप्त होते स्थानीय त्यौहारों की इस
श्रृंखला में एक और त्यौहार का नाम जुड़ने जा रहा हैं. इस त्यौहार का नाम है “पंवाड़’’
जो शायद उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में
यह त्यौहार ना मनाया जाता हो, लेकिन मेरे गृह क्षेत्र ग्वालखेत में किसी समय यह
त्यौहार काफी हर्षोल्लास से मनाया जाता था. अभी के समय में शायद ही कोई विलुप्त होने
की कगार पर खड़े इस त्यौहार को मना रहा हो.
कोई भी जीव हो, अपनी जिन्दगी में संघर्ष अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए ही करता है. कहा जाता है ना कि सबसे बड़ा भगवान पेट होता है. इसलिए किसी समय में अपने दाना पानी के लिए पूर्ण रूप से अपने खेत, अपने जानवरों पर निर्भर रहने वाले इन्सान के लिए उसके खेत और जानवर ही सबसे बड़े ईश्वर हुआ करता था. किन्तु आधुनिकता के इस तथाकथित समुचित रूप से विकसित युग में खान पान के लिए बाजारू खाने पर निर्भर होते आज के समाज के लिए अपने इन संसाधनों की आज उतनी महत्ता नहीं है, जितनी पहले हुआ करती था. किसी समय में लोगों के लिए होली, दिवाली से बड़े त्यौहार की मान्यता प्राप्त यह त्यौहार आज बस परम्परा की संज्ञा पाकर विलुप्त होने की कगार पर खड़ा हो गया है.
“पंवाड़” संज्ञा प्राप्त इस
त्यौहार का चलन और महत्व बहुत अधिक इसीलिए भी था क्योंकि ये त्यौहार हमारे खेत और
जानवरों से सम्बन्धित था. चैत्र माह में मनाए जाने वाले इस त्यौहार के लिए पंडितों
द्वारा सर्वप्रथम इस त्यौहार की पूजा का लग्न निकाला जाता था. बुजर्गों के अनुसार
लग्न निकालने की इस प्रक्रिया में बीज बोये जाने का दिन देखा जाता
है, और इस प्रक्रिया को “राशिपेट देखना” कहा जाता है.त्यौहार के दिन त्यौहार मनाने
की प्रक्रिया का शुभारम्भ घर की साफ़ सफाई से होता है.शाम को सर्वप्रथम घर में
पितरों की पूजा का प्रावधान है, जिसमे पितरों को दही-घी , चावल, आदि का भोग लगाया
जाता है.
इसके पश्चात शाम को लाए गए
बुरांश के पत्तों द्वारा एक विशेष पात्र (पूड़े) बनाया जाता है. जिनकी संख्या 5 होती
है. इसके पश्चात सभी परिवारों द्वारा पंवाड़ पूजा के लिए विशेष पकवान बनाए जाते
हैं. ये पकवान उड़द दाल के पकौड़े, दाल, चावल इत्यादि हैं. व्यंजन निर्माण के पश्चात
सभी पकवान,दही, पानी एवं पूजा की
सामग्रियों को लेकर अपने नजदीकी खेत में जाते हैं. खेत में पंहुचकर पांच पत्थरों
को देव स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है. पूजा विधि में सर्वप्रथम इन देव
स्वरूपी पत्थरों को तिलक लगाकर खड़ा किया जाता है. इसके उपरांत देव स्वरूपी पत्थरों
के सामने 3, 5 या 7 मुट्ठी धान बोया जाता है. इसके पश्चात बुरांश के पत्तों से
निर्मित पात्रों को पूजा स्थल पर रखकर 3 पात्रों या पूड़ों में चावल (भात), दाल और
दही लिया जाता है, चौथे पात्र में पकोड़े व अंतिम पात्र में पानी लिया जाता है.
इसके पश्चात इन देव स्वरूपी पत्थरों की पूजा की जाती है. इसके पश्चात देवों को भोग
चढाने के लिए लाए गए पकवानों में से भोग के पश्चात बचे पकवान को पूजा करने के लिए
पंहुचे छोटे बच्चे ग्रहण करते हैं. और खेतों से घर लौटते समय बच्चों के द्वारा “साट्यूँ का भारा, समोया का धारा" गाने के साथ ही इस त्यौहार का समापन होता है.
by प्रभात ड्यूँडी
by प्रभात ड्यूँडी



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