Friday, January 18, 2019



नन्दाष्टमी
            यूं तो भारतवर्ष त्योहारों का देश है. होली, दिवाली, विजयादशमी, सक्रांति आदि त्यौहार देशभर में काफी हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं लेकिन साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में अपने अपने क्षेत्रीय त्योहार भी सभी क्षेत्र वासियों द्वारा धूम धाम से सम्पन्न किए जाते हैं. जिनमे गढ़वाल क्षेत्र में मनाए जाने वाला एक त्यौहार नन्दाष्टमी या क्षेत्रीय भाषा में कहें तो “पाती” भी है. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाले इस त्यौहार या यूं कहें देवी पूजा के लिए प्रवासी बने लोग भी दूर दूर से अपने गाँवों में देवी से अपनी सुख समृद्धि की कामना करने के लिए देवदर्शन हेतु आए रहते हैं. सामान्यतया नन्दाष्टमी पाती का त्यौहार गढवाल क्षेत्र के उन गांवों में मनाया जाता है जहाँ नंदा देवी ग्रामीणों की ईष्ट देवी कही जाती है. “बधाण क्षेत्र” में नन्दाष्टमी का त्यौहार “स्यल पाती” के नाम से मनाया जाता है.
           
     



 नन्दाष्टमी का यह त्यौहार किसी इलाके में अष्टमी की तिथि को तो किसी क्षेत्र में नवमी की तिथि को मनाया जाता है. नन्दाष्टमी पूजा की शुरुआत पंचमी की तिथि से प्रारम्भ हो जाती है. मेरे गृह क्षेत्र ग्वालखेत में पंचमी के दिन गाँव के सभी परिवार गेंहू की नवीनतम फसल से प्राप्त गेंहू और सरसों को जमा करते हैं. जमा करने की इस प्रक्रिया को ग्रामीण भाषा में “म्य्वाख” कहा जाता है. पूजा में प्रयोग किए जाने के लिए जमा किए गए इस गेंहू को “ब्यूड़ा” कहा जाता है. जमा करने के पश्चात पंचमी को ही गाँव में किसी के द्वारा ब्यूडे भिगाए जाते हैं. जिस व्यक्ति द्वारा ब्यूड़े भिगाए जाते हैं, उन्हें उस दिन का उपवास धारण करना होता है. मेरे गृह क्षेत्र में पंचमी की सुबह को सर्वप्रथम गाँव में ईश्वर के बाल स्वरूप जिन्हें हमारे क्षेत्र में  “रुब्दाणू” देव कहा जाता है, उनकी पूजा का विधान है. इस पूजा के लिए गाँव के सभी परिवार गुड़, तेल, आटा इत्यादि जमा करते हैं. और इससे निर्मित प्रसाद लेकर पुजारी व साथ ही गाँव के बच्चे दूध लेकर ईश्वर के बाल स्वरूप की पूजा हेतु जाते हैं. जहाँ पर पुजारी द्वारा शंख ना बजाए जाने का भी नियम है. गाँव के बुजुर्गों के अनुसार ईश्वर यहाँ बाल स्वरूप में उपस्थित हैं इसलिए यहाँ शंख नहीं बजाए जाने का विधान है. 
          इस पूजा के पश्चात गाँव के जिस व्यक्ति द्वारा गेंहू और सरसों की फसल भिगाई जानी है वे धारे से एक बर्तन में जल लेकर गाँव के नन्दादेवी मन्दिर में जाते हैं तथा वहाँ वे सरसों की फसल को ताम्र धातु के बर्तन में तथा गेंहू की फसल को किसी बर्तन में भिगाते हैं तथा भिगाए गई फसल को मन्दिर में रखते हैं. अगले दिन अर्थात् षष्ठी तिथि को गाँव की महिलाओं द्वारा पिछली तिथि को भिगाई गई फसल को धोया जाता है. यदि गाँव में कोई नवविवाहित बहू आई हो तो उनके लिए इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए एक नियम का विधान है. यदि गाँव में किसी के द्वारा धान की फसल काट ली जाती है तो नवविवाहित बहू प्रक्रिया में शामिल नहीं होती है, लेकिन उस परिवार की अन्य महिला इस पूजा में शामिल हो सकती हैं. इस दौरान की धान कटाई को “ जड़कटी” नाम से उच्चारित किया जाता है. नन्दाष्टमी की पूजा में सम्मिलित लोगों के लिए कड़े नियमों का प्रावधान स्थापित है. इस प्रकिया में शमिल महिलाओं द्वारा षष्ठी की तिथि से लेकर अष्टमी की तिथि तक हर दिन उपवास रखा जाता है.साथ ही महिलाओं द्वारा ब्युड़े धोने के पूर्व किए गए स्नान के पश्चात किसी को भी उन्हें स्पर्श करने की अनुमति नहीं होती है; जब तक कि वे ब्युड़े को धोकर वापस मन्दिर में नहीं रख आतीं. ब्यूड़े भिगाते समय प्रयोग किए गए जल को ब्यूड़े धोते समय गाँव के सभी परिवारों में बाँटा जाता है, तथा वे इस जल को घर के आस पास लगी फसल की जड़ों में प्रवाहित करते हैं.
        मेरे गृह क्षेत्र में पाती का त्यौहार सप्तमी और अष्टमी दो दिन मनाया जाता है. सप्तमी की तिथि को दोपहर के समय तक गाँव के लोग “म्य्वाख” जमा करते हैं, जिसमें कि गुड़, तेल, आटा आदि जमा किया जाता है. इसके पश्चात गाँव से कुछ लोग जमा चीजों में से आधा सामान लेकर कोटी स्थित नंदा देवी के मन्दिर में पंहुचते हैं व वहाँ जमा चीजों से नन्दाष्टमी के प्रसाद की तैयारी करते हैं. तथा प्रसाद स्वरूप गुलगुले, रोंट(मीठी रोटी), हलुआ इत्यादि बनाए जाते हैं. तथा साथ ही रोंट बनाने हेतु गूंथे गए आटे की सहायता से आटे की लुइयों को बाघ, भालू, हिरन आदि जानवरों का आकार दिया जाता है. कहा जाता है कि देवी इन जानवरों से घर गाँव की तथा  लोगों की फसल की रक्षा करती हैं. गाँव के बच्चों द्वारा कुणजा नामक पौधे से दो अलग अलग पाती का निर्माण किया जाता है. और इस पौधे से ही निर्मित पाती को देवी मान कर इसकी पूजा की जाती है. कुणजे से निर्मित पाती के ऊपरी हिस्से में कौणी, जिसे काकनी नाम से भी जाना जाता है, की एक बाली को नथ स्वरूप लगाया जाता है व सम्पूर्ण पाती को देवी नंदा के स्वरूप में ढाला जाता है व मन्दिर परिसर में ही पत्थरों की सहायता से पाती को खड़ा किया जाता है. सप्तमी की पाती को “भितल पाती” नाम दिया गया है. साथ ही बधाण क्षेत्र में मनाए जाने वाले त्यौहार “स्यल पाती” में चीड के पेड़ का प्रयोग कुणजे के स्थान पर होता है.
            


  दूसरी ओर गाँव में नन्दाष्टमी पूजा में ब्यूड़े लेकर आने वाली महिलाएं घर की रसोई की सफाई कर स्नान करने के पश्चात पूजा के लिए तैयार होती हैं. स्नान के पूर्व के वस्त्रों को वे स्नान के पश्चात स्पर्श नहीं करती हैं. साथ ही उन्हें भी कोई स्पर्श नहीं करता है. यदि षष्ठी की तिथि से लेकर अष्टमी तक नन्दाष्टमी पूजा में शामिल होनी वाली किसी महिला को सांप दिख जाए तो भी उन्हें पूजा में शामिल होने की अनुमति नहीं होती. स्नान के पश्चात के श्रृंगार में उन्हें कंघी के भी प्रयोग की अनुमति नहीं होती और ना ही चप्पल इत्यादि पहनने की. इसके पश्चात वे बड़ी टोकरी के आकार का एक पात्र जिसे “छाबड़ी” की संज्ञा दी गई है, में ककड़ी के पत्तों में “खाजा”, “ककड़ी”, मक्का( मुंगरी), ब्यूड़े आदि लेकर नंगे पाँव 1.5 किलोमीटर पैदल पथरीले रस्ते से होकर कोटी स्थित नंदा देवी मन्दिर में आती हैं. नंदा देवी मन्दिर में महिलाओं द्वारा मन्दिर में प्रवेश करने के समय उनके पाँवों को धोया जाने का भी प्रावधान है. इसके पश्चात महिलाएं मन्दिर की परिक्रमा करती हैं. इसके पश्चात मन्दिर में पूजा अर्चना के पश्चात महिलाएं छाबड़ी को गाँव के मन्दिर में रख आती हैं तथा उसी के पश्चात उनको सामान्य दिनों की भांति रहने की अनुमति मिलती है.
            अष्टमी तिथि की पाती को स्थानीय बोली में “भैल पाती” कहते हैं. अष्टमी की पाती के दिन पुजारी के द्वारा सर्वप्रथम कोटी गाँव स्थित मन्दिर में पूजा अर्चना होती है. साथ ही अष्टमी को कोटी तथा ग्वालखेत दोनों गांवों की अपनी अपनी पाती मनाई जाती है, जहाँ कोटी गाँव की पाती कोटी गाँव स्थित नंदा देवी मन्दिर के चौक जिसे “खाल” नाम से उच्चारित किया जाता है, में मनाई जाती है तथा ग्वालखेत की पाती नंदा देवी के नए मन्दिर में मनाई जाती है. दोनों गाँवों में भी पाती के अलग अलग नियम हैं. एक ओर जहाँ कोटी गाँव में पाती पूजा में कोटी की बहुएँ ही नहीं वरन बेटियां भी प्रतिभाग करती हैं, जबकि ग्वाल्खेत की नन्दाष्टमी पूजा में केवल बहुओं को ही प्रतिभाग करने की अनुमति है.
           अष्टमी तिथि की सुबह से ही जिन परिवारों से छाबड़ी ले जाई जाती है, वहाँ देवी के लिए भोग स्वरूप विभिन्न पकवान पकने शुरू हो जाते हैं. जिनमें “रोंटाना”, “खाजा” इत्यादि महत्वपूर्ण भोग माने गए हैं. भोग तैयार करने के पश्चात सर्वप्रथम यह भोग ग्वालखेत गाँव में स्थित नंदा देवी मन्दिर, जीतू देवता मन्दिर, कालिंका मन्दिर में चढाया जाता है.  
           अष्टमी की पूजा के दिन भी दोपहर में गाँव के लोग
प्रसाद सामग्री लेकर कोटी स्थित मन्दिर में पंहुचते हैं तथा कुछ लोग कोटी गाँव स्थित पुराने मन्दिर में देव डोली के नृत्य देखने को पंहुचते है. कोटी तथा ग्वालखेत दोनों गाँवों के ईष्ट देव लाटू देवता तथा देवी नंदा देवी अपने पश्वों पर अवतरित होती हैं तथा देवनृत्य कर भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

           नंदा देवी के मुख्य पुजारी जो कि ग्वालखेत गाँव के ही रहते हैं, वे बांस के डंडों से बने एक पात्र जिसे स्थानीय भाषा में “कंडी” कहा जाता है, उसमें प्राण प्रतिष्ठा युक्त मूर्ति जो कि रजत धातु से निर्मित है; को पुराने मन्दिर से ले कर नए मन्दिर में आते हैं. साथ ही लाटू देवता का निशान तथा नंदा देवी की डोली भी पुराने मन्दिर से नए मन्दिर में पंहुचते हैं. नए मन्दिर स्थित गौरी कुंड में स्नान कर पूजा के पश्चात लाटू देवता के निशान को लेकर पुनः पुराने मन्दिर ले जाया जाता है. नए मन्दिर में स्थित इस गौरी कुंड की विशेषता यह भी है कि कुण्ड में प्रवाहमान होने वाली जलधारा का जल ना तो कभी बढ़ता है और ना ही कभी घटता है, चाहे उफनता बरसात हो या जमीन जल को तरसे इस कुण्ड के और कुण्ड की धारा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. देव डोलियों के स्नान के पश्चात कोटी गाँव की पाती पूजा सम्पन्न होती है. इसके पश्चात लाटू देवता के निशान सहित कोटी गाँव के लोग भी नए मन्दिर में पंहुचते हैं.

           सप्तमी की तिथि के ही नियमों का पालन करते हुए हमारे गाँव की महिलाएं छाबड़ी में रोंटाना, खाजा, ब्यूड़ा, ककड़ी, मुंगरी आदि भोग सामग्रियों को लेकर मन्दिर में पंहुचते हैं, जहाँ लाटू देवता व नंदा देवी अपने पश्वाओं पर अवतरित होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं.यह नियम भी महत्वपूर्ण है कि यदि महिलाओं के द्वारा सप्तमी की तिथि को पहने गए वस्त्रों को कोई स्पर्श कर लेता है तो अष्टमी की पूजा में उन्हें वह वस्त्रों को पहनने की अनुमति नहीं होती है.  नए मन्दिर में स्थित गौरी कुण्ड के जल से देव पश्वा भी स्नान करते हैं. पूर्व तिथि की भांति कुणजे की पौधे व कौणी की एक बाली से निर्मित पाती की पूजा अर्चना की जाती है. मांगल गीतों की पवित्र धुनों के साथ देव पश्वा सभी भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं व ककड़ी मुंगरी रोंटाना आदि को प्रसाद स्वरूप भक्तों को बांटते हैं. और इसी के साथ नन्दाष्टमी की पूजा सम्पन्न होती है. अष्टमी की शाम का भी बहुत अधिक महत्व है. जिन घरों से ब्यूड़े ले जाए जाते हैं वहाँ कुछ नई पैदावार के फलस्वरूप प्राप्त सब्जी तथा कुछ अन्य सब्जियों का मिश्रण कर शाम का प्रसाद तैयार किया जाता है. और इसे रोंटाना व ब्यूड़ा समेत गाँव के सभी परिवारों को दिया जाता है, इस प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में “पैणा देना” कहा जाता है. और शाम के इस शानदार व्यंजन के भोग के साथ नन्दाष्टमी का सम्पूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न होता है.
              आध्यात्म की दृष्टि से उत्तराखंड के सभी स्थानीय त्यौहार महत्वपूर्ण होते हैं. लेकिन साथ ही पर्यावर्णीय महत्व और सामाजिक महत्व की दृष्टि से भी ये महत्वपूर्ण होते हैं. नन्दाष्टमी के त्यौहार का भी सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है. आधुनिकता के इस युग में भी जहाँ कि आज हर कोई एक दूसरे मोबाइल फोन, टेलीफोन आदि से जुड़ा हुआ है. किन्तु पूर्व समय में जब एक दूसरे से सम्पर्क करने के पर्याप्त साधन हर जगह नहीं हुआ करते थे तो विभिन्न त्यौहारों पर भाई अपनी बहनों को बुलाने उनके घरों तक जाते हैं. कभी यह परम्परा मात्र परम्परा ना होकर एक भावना थी, लेकिन आज भी नन्दाष्टमी जैसे कुछ एक के त्यौहारों पर यह परम्परा संजीवनी खोजती रहती है. गाँव की विवाहित बेटियां जिन्हें ध्याण बेटियां कहा जाता है, नन्दाष्टमी के त्यौहार पर आज भी अपने मायके आई रहती हैं. गाँवों में विभिन्न त्यौहारों पर प्रसाद और व्यंजनों को गाँव में बांटने की परम्परा प्रबल रूप से जीवित है. नन्दाष्टमी पर भी देवी के प्रसाद को बांटने की परम्परा है. यही परम्पराएँ गाँवों में आपसी भाई चारे के मजबूत स्तम्भ होती हैं.
          नन्दाष्टमी के त्यौहार के पर्यावर्णीय महत्व को देखा जाए तो कुणजे से बनने वाली पाती की नथ के रूप में प्रयोग होने वाली कौणी या काकनी आज दुनिया भर में ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में भी विलुप्त होने की कगार पर है, किन्तु नन्दाष्टमी पूजा के लिए ही सही, लोग ग्रामीण क्षेत्रों में इस वनस्पति को बचाने में लगे होते हैं. साथ ही  नन्दाष्टमी की शाम को बनने वाली सब्जियों में अधिकतर अपने ही खेतों में उगी सब्जी का प्रयोग होता है. अत: कहा जा सकता है कि रोजमर्रा की भोजन व्यवस्था के लिए लोग भले ही बाजारू सब्जियों पर निर्भर होने लगें लेकिन नन्दाष्टमी के त्यौहार के लिए घरों में सब्जियों जरुर उगाई जाएंगी. साथ ही देवी के भोग स्वरूप बनने वाले स्थानीय पकवान जैसे खाजा, मीठी रोटी, रोंट, रोंटाना आदि जो कि उत्तराखंड की संस्कृति के अभिन्न अंग हैं इस त्यौहार के बदौलत हमेशा जीवित रहेंगे.  
 
BY- प्रभात ड्यूंडी  

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