गाँव और त्यौहार
देवों की इस पवित्र देवभूमि में दिवाली,होली
व अन्य त्यौहारों से लेकर विभिन्न स्थानीय त्यौहारों को विभिन्न क्षेत्रों में
अपने क्षेत्रीय नियमों का अनुपालन करते हुए मनाए जाते हैं. मेरे गृह क्षेत्र
ग्वालखेत में भी अनेकों ऐसे त्यौहार मनाए जाते हैं. उनमें से कई ऐसे त्यौहार भी
हैं जिनका प्रचलन शायद अब उतना नहीं है, जितना पूर्व समय में हुआ करता है. आज यदि इन
त्यौहारों की खूबसूरती को शब्दों में संजो के रखा जाए तो शायद आगे की पीढ़ी इसकी शुरुआत
फिर उसी उत्साह के साथ करे.जहाँ देश विदेशों से पंहुचे पर्यटक शीत ऋतु की बर्फ के दर्शन करने को लालायित रहते हैं, वहीं उत्तराखंड के कई पहाड़ी क्षेत्रों की भांति मेरे ग्रामजनों को भी हर साल की सर्द ऋतु में इस सफेद चादर के गर्म चाय के गिलास के साथ दर्शन का वरदान सृष्टि की उत्पत्ति से ही प्राप्त है. जहाँ ये श्वेत वर्णित मुलायम चीज खूबसूरती की एक मिसाल होती है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में समस्याओं का कारण भी बनती है.
लेकिन इस अस्थायी समस्या को इतर रखते हुए बात करते हैं, इस बर्फ के एक अलग महत्व की. पर्यटकों के लिए ये सफेद चादर खेल का साधन होता है. वहीं मेरे गाँव के बच्चों के लिए इसकी कुछ अलग महत्ता रहती है.
मेरे गाँव के बच्चे इस सफेद चादर को एक देवी के स्वरूप में ढालते हैं व सम्पूर्ण श्रृंगार कर और पूरे गाँव में टोली बनाकर इसे घुमाते हैं.देवी के स्वरूप को “हिंवाली देवी” नाम दिया जाता है. इस टोली को गाँव के सभी परिवार चावल, घी, तेल, गुड़,चीनी आदि देते हैं. अंत में सभी घरों से घूमकर आए बच्चे बर्फ के इस देवी स्वरूप “हिंवाली देवी” को गाँव के ही नंदा देवी मन्दिर में रख आते हैं तथा सभी घरों से एकत्र किए सामान को एक ऐसे स्थान पर ले जाते हैं जहाँ पर इनसे प्रसाद स्वरूप एक विशेष पकवान (दले हुए चावलों का हलुआ) बनाया जाता है. आधुनिकता के इस दौर में कोई परम्परा को भले कुछ भी कहे किन्तु मासूमियत के साथ बनाए गए इस प्रसाद स्वरूप पकवान का स्वाद अवश्य ही हर किसी को आत्मीय सुख की अनुभूति करवाता है.




Very good keep writing continuously
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