Wednesday, May 1, 2019

वो-2


            वो अभी भी अपनी जिन्दगी हंसी ख़ुशी, उत्साह उमंग के साथ जी रहा था. जो मन में आता कर देता, जो मन में आता कह देता. उसके लिए कोई छोटा बड़ा नहीं था, चाहे उम्र के लिहाज से हो चाहे किसी ओर पैमाने के. अब धीरे धीरे उसका शब्दकोश और ज्ञानकोश और भी अधिक बढ़ रहा था, और अपनी आँखों के सामने घटने वाली हर घटना पर गौर भी कर रहा था. हर एक घटना को गौर से देखता, उसके बारे में सबसे पूछता, सामने दिखने वाली हर चीज के बारे में जानने की हमेशा उसमें उत्सुकता रहती. बिना उत्तर जाने वो चुप ना बैठता.  हर एक प्रकल्पना का उसे उसकी समझ के अनुरूप तार्किक उत्तर चाहिए रहता था. उसकी  रचनात्मकता अब और भी मजबूत होती जा रही थी. चाहे सामने पड़े उसके खिलौने हों चाहे घर का कोई सामान हर एक चीज को जानने की उसमे कौतूहलता बनी ही रहती. कई बार तो खिलौनों और अन्य सामानों को पटक पटक तोड़ देता. सामने गाने वाले टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले चित्रों पर भी बार बार हाथ मारता रहता. अपने सामने पड़े खिलौने, जिनमें से कुछ एक में कुछ गानों की धुनें आ रही थीं तो किन्हीं में से कुछ अलग अलग आवाजें. लेकिन उसके लिए ये अचरज भरा था कि कुछ एक ही चीजों  से ये आवाजें क्यों आती हैं. वो कभी कभी हर एक चीज को खोल देता, तोड़ देता बस यही जानने की जिज्ञासा में कि वो आवाजें उसे सुनाई क्यों दे रही हैं. वो कभी कभी खिलौनों के पेज पुर्जों को अलग अलग कर विभिन्न तरीकों से जोड़ने की कोशिश भी करता. हर एक चीज के बारे में जानने की जिज्ञासा के प्रति एसा समर्पण और इतने कर्म करने में लगने वाली ऊर्जा ना जाने उसमे कहाँ से आती.
           “भगवान” इस शब्द की सुपरिभाषित व्याख्या उसे आजतक समझ ना आई थी. खैर उसे इतना जानने की जरूरत भी महसूस ना होती क्योंकि भगवान कभी उसके सामने आकर कुछ करते भी कहाँ थे. लोग भी उसे यही बताते कि घर में, मन्दिरों में एक शिला, एक तस्वीर है बस वही हैं जो भगवान हैं, ईश्वर हैं. शुरुआती दौर में उसे बस यही पता होता कि ईश्वर के सामने हाथ जोड़ना होता है. ईश्वर की पूजा में होने वाली आरतियाँ भी उसे अच्छी लगती. पूजा के समय आने वाली घंटियों की आवाजें और शंख ध्वनि भी उसे खुश कर देती. वो भी उन वाद्य यंत्रों को बजाने की कोशिश करता, और जितना जोर लग पाता उतने जोर से घंटियों को बजाने की कोशिश करता. उसने लोगों को यह कहते भी सुना था कि बच्चे भी भगवान का ही स्वरूप होते हैं. लेकिन चूंकि वो भगवान को ही नहीं जानता था, तो एसी बातों को भला क्या समझता. ईश्वर की पूजा के विभिन्न विधानों, नियमों, परम्पराओं, कर्मकांडों को वह नहीं समझता था. किन्तु उसे यह अवश्य पता था कि ईश्वर मांगों को पूरा करते हैं.
           एक दफा उसकी बड़ी बहन को खेलते खेलते चोट लगी तो वह घर के बाहर से कीचड़ में भीगे चप्पलों को लेकर घर के पूजा घर में पंहुच गया और शिला रूपी ईश्वर से अपनी बहन की चोट ठीक करने की नादान गुजारिश करने लगा. इसी बीच घर के किसी बड़े ने उसे कीचड़ से लबालब पादुकाओं सहित मन्दिर में देखा तो उसे यह कहकर समझाने लगे कि ईश्वर के मन्दिरों में इस प्रकार गंदगी सहित जाएँगे तो ईश्वर तुम्हारे साथ बुरा करेंगें, हो सकता है आँख भी फोड़ दें. अबसे वह ईश्वर से डरने लगा था. अब तो कभी कभी ईश्वर को नादानी में अपनी मांग पूरी करने के लिए रिश्वत भी दे देता, कभी चॉकलेट,कभी मिठाई की तो कभी खिलौनों की. उसका स्वच्छ मन शायद अब धीरे धीरे ईश्वर के उस रूप को समझने में नाकाम होने लगा था, जिसे श्रद्धा रूपी भावों से पूजा जाता है ना कि डर से. और जीवन की प्रौढ़ावस्था शुरू होने के पश्चात से उसके जीवन में आने वाले विभिन्न तनावों के बढने और उनसे मुक्ति पाने के लिए ही वह ईश्वर के उसी एक आयाम की पूजा करने लगा, जो बस मांगें पूरी करता है और मन्दिर में गंदगी लाने पर दंडित करता है. साथ साथ अब उसे साँस लेने वाले हाथ पांव हिलाने वाले बाबाओं जो कि चाउमीन, मोमो खाकर समस्याओं का हल बताने वाले भी ईश्वर से बड़े प्रतीत होने लगे थे.   
          प्रभात ड्यूंडी

2 comments:

  1. प्रभात भाई 👌👌 बहुत खूब लिखा।

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  2. धन्यवाद सर्.....🙏❤️

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