Tuesday, April 30, 2019



“वो”
          वो दिखने में किसी के लिए भी कुछ अलग सा नहीं था, लेकिन तभी भी बहुत से लोग उसे देखे जा रहे थे क्योंकि उन लोगों को उसमे कुछ तो अलग सा दिख रहा था. उसकी हर क्रिया लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी; हंसना, रोना, चिल्लाना उसकी हर एक बात में लोगों को बस खूबसूरती ही दिख रही थी. उन्हें उसे बस एक टक देखने का मन कर रहा था. शायद ही उनमे से किसी को उससे नजरें फेरना मंजूर हो. उसके नाना प्रकार के क्रियाकलाप उन्हें आत्मीय सुख दे रहे थे.
            


              उन सबके बीच बस वही एक था जो समाज की सभी परम्पराओं से मुक्त होकर बस स्वतन्त्रता का आनन्द ले रहा था. वो जो करता निश्छल मन से करता रहता. निष्कपट भाव से वो बस ख़ुशी ख़ुशी जी रहा था. शायद उसे या तो जीने का सही तरीका मालूम था या तो उसने अन्य लोगों की भांति जीवन जीना ही नहीं सीखा था. वो लोगों को बिना जात-पात, ऊंच नीच, धर्म  के तराजू में तोले देखता था. उसके लिए भगवान भी शायद बस वही था जो उसकी मांगों की खानापूर्ति कर दे. और उसकी ऊर्जा एसी थी मानो बड़े से बड़े दौड़ भाग करने वाले  खिलाडी की ऊर्जा उसकी ऊर्जा के सामने बहुत छोटी सी हो. और किसी जिद के प्रति एसी एसा समर्पण भाव कि बिना मनवाए ना माने. उसकी रचनात्मकता का शायद ही उस समय कोई सानी हो. कोई भी भाव वो अपने अंदर नहीं छिपाता. चाहे वो प्यार का हो या गुस्से का हर भाव को पूरी ऊर्जा के साथ प्रकट करता. शायद उसे अभी तक खुद को छिपाना नहीं आया था. उसके अंदर अभी द्वेष, इर्ष्या, घृणा आदि भावों का प्रादुर्भाव होना शुरू भी नहीं हुआ था. उसे सब अपने से लगते, चाहे वह किसी भी जाति धर्म का हो. लोगों को भी वह संसार का सबसे सुखी जीव लगता, जिसकी जिन्दगी चिंतामुक्त, तनावरहित थी. सब लोग उस जीवन की अपेक्षा कर रहे थे, कि काश वे भी ऐसे ही चिंतामुक्त हो पाते, किन्तु उन लोगों में से शायद ही कोई ऐसा हो जो उसके सुखी होने के लक्षणों को खुद के भीतर समावेशित करना चाहता हो. वो सब उसके जैसा बनना चाह रहे थे लेकिन उन गुणों को आत्मसात करने का साहस उनमे से कोई भी जुटा नहीं पा रहा था. वो शायद उनके मनो-मष्तिष्क के भीतर घूम रहा बस उनका बचपन था.  
                                                                                                           प्रभात ड्यूंडी 

4 comments:

बाल स्वरूप

                     निश्चित ही बाल स्वरूप ईश्वर की प्रतिमूर्ति होती है. 1 दिन से भी कम जिसे इस दुनिया में हुए हैं, उसका स्पर्श पाना,...